Kaavyaalaya     home ... random poem ... about us ... feedback ... updates ...
shilaadhaar ... yugvani ... navakusum ... kaavya setu ... pratidhwani ... muktak ... kaavya_lekh ...

Can't view the Hindi text? click here


सखी, इन नैनन तें घन हारे ।
बिन ही रितु बरसत निसि बासर, सदा मलिन दोउ तारे ॥
ऊरध स्वाँस समीर तेज अति, सुख अनेक द्रुम डारे ।
दिसिन्ह सदन करि बसे बचन-खग, दुख पावस के मारे ॥
सुमिरि-सुमिरि गरजत जल छाँड़त, अंसु सलिल के धारे ॥
बूड़त ब्रजहिं 'सूर' को राखै, बिनु गिरिवरधर प्यारे ॥

- सूरदास

* * *

Back

Ref: Swantah Sukhaaya
Pub: National Publishing House, 23 Dariyagunj, New Delhi - 110002