Kaavyaalaya     home ... random poem ... about us ... feedback ... updates ...
shilaadhaar ... yugvani ... navakusum ... kaavya setu ... pratidhwani ... muktak ... kaavya_lekh ...

Can't view the Hindi text? click here

काश हम पगडंडियाँ होते

यों न होते
काश !
हम पगडंडियाँ होते

इधर जंगल - उधर जंगल
बीच में हम साँस लेते
नदी जब होती अकेली
उसे भी हम साथ देते

कभी उसकी
देह छूते
कभी अपने पाँव धोते

कोई परबतिया
इधर से जब गुज़रती
घुघरुओं की झनक
भीतर तक उतरती

हम
उसी झंकार को
आदिम गुफाओं में सँजोते

और-भी पगडंडियों से
उमग कर हम गले मिलते
तितलियों के संग उड़ते
कोंपलों के संग खिलते

देखते हम
कहाँ जाती है गिलहरी
कहाँ बसते रात तोते

- कुमार रविन्द्र

* * *

Back

Kumar Ravindra
Email: kumarravindra310<at>gmail.com