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अभिषेक

असर्जि वक्वा रथ्ये यथाजौ, धिया मनोता प्रथमा मनीषा ।
दश स्वसारो अधि सानो अव्ये, मृजन्ति वह्निं सदनेष्वच्छ ॥
- सामपूर्वाचिक ६।५।११

आज दशों दिशाएँ सखियाँ बनकर परम प्रभु की अर्चना के
लिए आकाश से पृथ्वी पर उतरी हैं। वे पूरे विवेक और
संकल्प के बाद अपने पूज्य देवता का अभिनन्दन करने
आई हैं। हमारी वाणी भी आज उसी परमदेव की स्तुति
करने को मुखरित हुई है।

          आज हमारा है अभिषेक,
          रक्तिम आज क्षितिज की रेख ।
          दशों दिशाएँ सखियाँ बनकर,
          महासिन्धु से स्वर्ग कलश भर
          रंग - रंग के परिधानों में,
          नभ - मन्डल से उतरीं भू पर ।

          आज हमारा है अभिषेक,
          रक्तिम आज क्षितिज की रेख ।

          आज मनीषा मंगलमय हो,
          उल्लासों से पूर्ण हृदय हो ।
          पृथिवी नभ के अन्तराल में,
          गूँज रहा स्वर जय जय जय हो ।

          आज हर्ष का है अतिरेक,
          रक्तिम आज क्षितिज की रेख ।

          लोक - लोक के पुष्प सुगन्धित,
          करने को श्रद्धा निज अर्पित,
          आज सागरों के अंतर में,
          भरा भावना का आवेश ।

          आज हमारा है अभिषेक,
          रक्तिम आज क्षितिज की रेख ।

- सत्यकाम विद्यालंकार

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